सोमवार, २१ जुलै, २०२५

सुशीला मेरी सहेली .

       

                       
        सुशिला  सहेली  मेरी                                                                                           शायद वह साल होगा १९५५ का। मै सातवी कक्षा में पढ़ता था। चांदवड के रंग महल में हमारी पाठशाला भरती थी। मै मेरे चचेरे भाई के यंहा रहता था जो भी प्रायमरी टीचर थे।


                                                          शाम में मै जादा क्लास को जाता था। वह क्लास एक लेडी टीचर चलाती थी। जो मेरी मुंह बोली बहना थी । उस क्लास में मै अकेला लड़का बाकी सब लड़किया थी। क्लास में मै हमेशा अव्वल होनेसे किसीने और कभी भी आपत्ती ना की। सभी से मेरा बर्ताव दोस्ती का रहा। ना किसी से नजदीकी ना किसी से दुश्मनी रही। फिर भी सुमन क्षत्रिय और सुशीला दुसाने के साथ मेरी दोस्ती अधिक तर रही। हर इतवार को कभी चंद्रेश्वेर तो कभी कोम्बड़ वाडी हम जाते रहे। मौजमजा करते रहे । पढाई में हमारे अंक हमेशा अच्छे रहे।
सुबह जब मै ताई; जो मेरी बहना भी थी के घर जाता तो सुशीला मुझे देखते ही खुसी से खिल उठती । साथ में लाया गुलाब का फूल मुझे देती । उसके गालो पर भी गुलाब खील उठते मै भी कैसे फुला न समाता । क्या यह प्यार था ; या थी दोस्ती । दिन जा रहे थे । सभी सिलसिला दव बिन्दु जैसा पवित्र विचारो से चलता रहा।

                                                                  आई इम्तहान की घड़ी । तब सातवी की परीक्षा देने मनमाड जाना पड़ता था। हम भी वंहा गए। जब भी मौका मिलता सुशीला का एक ही प्रश्न होता ;तुम मुझे भूल तो नहीं जायेंगे। मेरा भी जवाब होता यह कैसे मुमकिन है सुशीला ?

                                                      शाम का समय था । कल पहला पेपर होने के कारन सभी पढाई में मगन थे .मै भी पढ़ रहा था। सुशीला मेरे पास आई और रुमाल से हवा लहराती रही । मेरा ध्यान हट गया। नजदीक शाही की जो बोतल थी वह उलट गयी। मेरे चप्पल पर ही वह गिरने से चप्पल गंदी हो गयी। मै थोडा डाटा तो सुशीला रोने लगी। सब सहेलिया उसे समझाती रही फिर भी उसका रोना रुकता नहीं था। मै भी परेशा हुआ । क्या करू .कैसे समझाऊ ; कुछ भी सूझता नहीं था।
                                                   अब अँधेरा घिरने लगा था। सुमन मेरे पास आयी और बोली अरे बुद्दू वह तुझसे कितना प्यार करती और तू नादाँ कुछ समझता ही नहीं। मै हक्काबक्का हो गया। यही था मेरा पहला प्यार। जो मुझे आगे रास न आया ।
दिन बितते गए। नयी उमंग लेके नया साल आया । बस अब
रिजल्ट ही आनेवाला था । जून में रिजल्ट लगा .हम सभी पास हो गए। मै भी खुसिसे खील उठा । फिर से हम ना मिल सके । हमेशा के लिए हम खो गए.
                 आज़ मै ७५  साल का हू . मेरी पत्नी जया  और परिवार के साथ जिंदगी ढल  तो रही फिर भी ऎसे ही कभी कभी हवा की लहर सुशीला को मेरे सामने खड़ी  कर मुझे झंकझोर  करती  हैं . ।
                     मन ही मन मे  उठती हैं आंधी, पुछती --वह कन्हा होगी /क्या करती होगी । बार बार  ;  वही  सवाल  '    तुम मुझे  भूल  तो नही  जा ओगे ?